साम्राज्यवाद का अर्थ
जब कोई शक्तिशाली राष्ट्र किसी दुर्बल राष्ट्र के आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन पर नियंत्रण स्थापित कर उनका शोषण करता है तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं दूसरे शब्दों में जब कोई राष्ट्र शक्ति का प्रयोग कर किसी अन्य राष्ट्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेता है तथा उसके आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों का हनन करके उसे अपने नियंत्रण में ले लेता है तो ऐसा राष्ट्र साम्राज्यवादी कहलाता है और इस प्रवृत्ति को साम्राज्यवाद कहते हैं।साम्राज्यवाद की परिभाषा
साम्राज्यवाद वह अवस्था है जिसमें पूंजीवादी राज्य शक्ति के बल पर दूसरे देशों के आर्थिक जीवन पर अपना नियंत्रण स्थापित करते हैं- डॉ. संपूर्णानंद
शक्ति और हिंसा के द्वारा किसी राष्ट्र के नागरिकों पर विदेशी शासन तक नहीं साम्राज्यवाद है।
- शूमां
साम्राज्यवाद के विकास की अनुकूल परिस्थितियां
१. औद्योगिक क्रांतिअब तक एशिया और अफ्रीका के देशों में औद्योगिक क्रांति नहीं आई थी यहां होने वाले उत्पादन का उपयोग प्राचीन ढंग से हाथों द्वारा ही होता था अतः यहां पर साम्राज्यवादी देशों के लिए उपयुक्त बाजार एवं कच्चा माल उपलब्ध था।
२. सैन्य शक्ति कमजोर
एशिया एवं अफ्रीका के देश सैनिक दृष्टि से अत्यधिक कमजोर थे वे यूरोपीय शक्ति के आगे टिक नहीं सकते थे ना तो उनके पास आधुनिक हथियार होते थे और ना ही संगठन की शक्ति उन्हें प्रशिक्षण भी ऐसा नहीं दिया जाता था कि वे सक्षम सैनिकों या प्रशिक्षित सेनाओं का मुकाबला कर सके।
३. राष्ट्रीय एकता का अभाव
पश्चिमी देशों की तरह एशिया और अफ्रीका के राज्य एकता के सूत्र में बंधे हुए नहीं थे वह आपसी स्वार्थों को लेकर आपस में लड़ते झगड़ते थे वह कभी संगठित होकर बाहरी शत्रु का सामना नहीं करते थे।
४. मध्यमवर्ग का आभाव
एशिया एवं अफ्रीका के देशों में प्रभावशाली मध्यमवर्ग का अभाव था जनसाधारण राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहता था उसे अपनी रोजी रोटी जुटाने में इस सारी शक्ति लगानी पड़ती थी।
५. राजनीतिक अस्थिरता
शासक वर्ग अपनी विलासिता में डूबा रहता था प्रजा हित के कार्यों में उसकी जरा भी रुचि न थी जनता भी अपने शासकों के प्रति सहानुभूति नहीं रखती थी आए दिन विद्रोह और षडयंत्र एवं मारकाट होते रहते थे इससे प्रशासन की जड़ें कमजोर हो गई थी।
साम्राज्यवाद के प्रभाव
19वीं सदी के अंतिम दशक तक साम्राज्यवाद ने एशिया और अफ्रीका की पूरी तरह अपने पंजों में जकड़ लिया था विश्व की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या पर विदेशी शासकों ने अपना अधिकार कर लिया था साम्राज्यवाद का प्रभाव लोगों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूपों में पड़ा था।सकारात्मक प्रभाव:-
१. राष्ट्रीय एकीकरण
साम्राज्यवादी देशों ने अपने उपर निवेशकों में एक ही तरह के कानून न्याय व्यवस्था और आर्थिक नीति लागू की साम्राज्यवादी देश पूरे उपनिवेश को एक राजनीतिक और आर्थिक इकाई मानकर शासन करते थे जिसके फलस्वरूप उपनिवेश की जनता में एकता और राष्ट्रीयकरण की भावना उत्पन्न हुई हमारा भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
२. यातायात और संचार के साधनों में सुधार
अपनी उपनिवेशन का पूरी तरह से शोषण के लिए साम्राज्यवादी देशों में उपनिवेश ओं में यातायात एवं संचार के साधनों में सुधार किया जिसके फलस्वरूप निवेशकों को नवीन यातायात और संचार के साधन प्राप्त हुए और वहां पर रेलवे एवं टेलीफोन जैसे साधनों का विकास हुआ।
३. आंशिक उदारीकरण
यूरोप की पूंजी पतियों का था सरकार ने अधिक लाभ कमाने के लिए निवेशकों में कुछ आधुनिक उद्योग भी लगाए।
४. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार
औपनिवेशिक देशों में अपने व्यापार व उद्योगों को चलाने के लिए बहुत अधिक संख्या में कलर को एवं छोटे कर्मचारियों की आवश्यकता को देखते हुए साम्राज्यवादी देशों ने वहां पर पाश्चात्य ढंग की शिक्षा भाषा एवं साहित्य का प्रचार प्रसार किया इसके फलस्वरूप उपनिवेश ओं में पश्चिमी विचारधारा का प्रचार हुआ सांची वहां स्वतंत्रता समानता तथा लोकतंत्र के प्रति प्रेम विकसित हुआ।
५. नए प्रदेशों की खोज
साम्राज्यवाद के प्रसार के कारण विश्व के अनेक नए प्रदेशों की खोज की गई साम्राज्य वादियों ने वहां पर अपनी उपनिवेश बताएं जिससे विश्व के विभिन्न भागों में सभ्यता और संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ।
नकारात्मक प्रभाव
१. आर्थिक शोषणसाम्राज्यवादी देश एशिया और अफ्रीका के देशों से सस्ते दामों पर कच्चा माल उठाते और फिर तैयार माल उन्हीं देशों में ऊंचे दामों पर बेचकर भारी लाभ कमाते थे और कृषि क्षेत्र में भी उन्होंने बहुत ज्यादा शोषण किया।
२. आर्थिक पिछड़ापन
साम्राज्यवादी देशों द्वारा अपने उपनिवेश ओं की कृषि और उद्योग एवं व्यापार के विकास में कोई रुचि नहीं ली जाती थी बस उनसे सिर्फ काम करवा कर बहुत ही कम मजदूरी दिया जाता था।
३. निरंकुश शासन
साम्राज्यवादी देश अपने देश में स्वतंत्रता समानता आदि की बात करते थे किंतु अपने ही उपनिवेश ओं में उनका व्यवहार निरंकुश तथा दमनात्मक रहता था।
४. युद्ध और अशांति
यूरोपीय देश अधिक से अधिक उपनिवेश प्राप्त करना चाहते थे जिसके कारण वे आपस में लगातार युद्ध करने की स्थिति में रहते थे वह सभी जानते थे कि अधिक उपनिवेश रखने से अधिक मात्रा में कच्चा माल प्राप्त करने के स्त्रोत तथा माल बेचने के लिए बाजार उपलब्ध होंगे।
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